Sunday, May 5, 2019
Saturday, May 4, 2019
अन्धेरी रात की सड़के
********************
निसठुर धूमिल धुधलि रात
साय साय तीव्र मुग्ध निनाद!
छिन्न भिन्न रतिका का सुपरभात
विमल इन्दु कि वाद विवाद!
मेघ छवि सि कडके
अधेरि रात की सडके
निहित राज अनेक अवर्णीय
तिक्ष्ण भूरा प्रकाशहीन!
काला फिका म्लान दृश्य
नेत्र भ्रमण होता भिन!
देख वसुधा का अन्तस्थल धडके
अधेरि रात कि सडके
अन्धकार युक्त विहवल रजनी
अहवहन झंझरी अविरल प्रखर!
होता विराट घनेरि रात रात्नि
जैसे समझ खडा काला शिखर!
रात्रि भ्रमण कर मन बहके
अन्धेरि रात का सडके
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निसठुर धूमिल धुधलि रात
साय साय तीव्र मुग्ध निनाद!
छिन्न भिन्न रतिका का सुपरभात
विमल इन्दु कि वाद विवाद!
मेघ छवि सि कडके
अधेरि रात की सडके
निहित राज अनेक अवर्णीय
तिक्ष्ण भूरा प्रकाशहीन!
काला फिका म्लान दृश्य
नेत्र भ्रमण होता भिन!
देख वसुधा का अन्तस्थल धडके
अधेरि रात कि सडके
अन्धकार युक्त विहवल रजनी
अहवहन झंझरी अविरल प्रखर!
होता विराट घनेरि रात रात्नि
जैसे समझ खडा काला शिखर!
रात्रि भ्रमण कर मन बहके
अन्धेरि रात का सडके
समय
समय आ रहा अनन्त शान्त से
न बूझो न देखो क्लान्त श्रान्त से
कभी समय केवल मात्र नाम था
उसमे भी केवल घ्रर उद्दम था
कई बर्ष पहले
खुली शाम थी
आकाशगंगा के पहले
तम शान्त थी
प्रलय आ गया फिर कोश प्रान्त से
सचेत किया किया न अंकित
प्रलय का होना चाहिए सिध्दांत से
मची फिर तबाही हुआ वो न संकेत
कई बर्ष पहले
खुली शाम थी
आकाशगंगा के पहले
तम क्लान् थी
निश्चय ही आयी घटा को आगडाई
कई वर्ष बीते दुनिया बस आयी
उसमे भी थमी न आग बन पायी
कभी ज्वाला फूटे कभी भूकम्प आयी
कई बर्ष पहले
खुली शाम थी
आकाशगंगा के पहले
तम क्रान्त थी
नीली भंग जिसकी बनी पृथ्वी वह
बसे चिर चिरागुन बसे आर्थिवी वहा
देखा फिर मंजर बने पार्थिवी वह
आज वहा देखो, देखो आबादी वहा
कई बर्ष पहले
खुली शाम थी
आकाशगंगा के पहले
तम शान्त अक्रन्त थी
समय आ रहा अनन्त शान्त से
न बूझो न देखो क्लान्त श्रान्त से
कभी समय केवल मात्र नाम था
उसमे भी केवल घ्रर उद्दम था
कई बर्ष पहले
खुली शाम थी
आकाशगंगा के पहले
तम शान्त थी
प्रलय आ गया फिर कोश प्रान्त से
सचेत किया किया न अंकित
प्रलय का होना चाहिए सिध्दांत से
मची फिर तबाही हुआ वो न संकेत
कई बर्ष पहले
खुली शाम थी
आकाशगंगा के पहले
तम क्लान् थी
निश्चय ही आयी घटा को आगडाई
कई वर्ष बीते दुनिया बस आयी
उसमे भी थमी न आग बन पायी
कभी ज्वाला फूटे कभी भूकम्प आयी
कई बर्ष पहले
खुली शाम थी
आकाशगंगा के पहले
तम क्रान्त थी
नीली भंग जिसकी बनी पृथ्वी वह
बसे चिर चिरागुन बसे आर्थिवी वहा
देखा फिर मंजर बने पार्थिवी वह
आज वहा देखो, देखो आबादी वहा
कई बर्ष पहले
खुली शाम थी
आकाशगंगा के पहले
तम शान्त अक्रन्त थी
छाये रे बादल बलहारी मेघ व्योमपति छाये
पर्ण कुटीर की छाया मे अपने दृगजल लाये
नव अंकुर फूट रहे अमृत कलश के भेद से
सुरभि समीर प्रवाहन अतितीव्र प्रमोद से
सुरज कि छवि मुदि मेघ के आह्वान से
देख मोहक मधुर बादल मन हरषे सावन मे
जलदल पति मेघ झुर्रिया टपकाते
पराग मुक्ता निर्माण कर धरा अचल कर जाते
विशाल जलधि कि सजगदृग मधुर गीत गाते
सन्ध्या कि गन्धवाह मे प्रतिरूप कुमुद छिडकाते
नव - समीर लाके जल आन्तस्थल बरसा गये
दुर्वादल मे रजत धार सींच हरियाली ला गये
छिडक व्योम जल गगरी छिडका गये
चित्त मे घनपति जल प्रति प्रेम हरसा गये
तट - तट दृगजल भर गोरा बादल घिर रहे
क्षितिज तरूवर धैर्ध पर मधुर वेग से बढ रहे
इन्द्रधनुष
************
झलके घटा इन्द्रधनुष कि
भरे सतरंग चमक पुलक भरे
वह झलक रहा व्योम धरा के सीने मे
पुलकित किया आकाश को
अन्तर लिये धनु रंगिले से
चमक पडा था धीरे से
व्योम धरा के सीने मे
मेघ आये सतरंगे आाये
सतरंगो से इन्द्रधनुष भाये
अन्नत कण धनुष सतरंगो के
झलके थे धीरे से व्योम धरा के सीने मे
निकला क्षितिज पर जो देखने मै
भागा
रेशम स लटक रही पोशाक सीने का
धागा
प्राता कि निशा मे जब सपने से
जागा
देखा सुबह कि अरुणाई मे इन्द्रधनुष
सुभागा
नभ के उजाले मे निकला एक कोष मे
आधा
चन्द्र स चमके सतरंग यौवन पर उससा न
दागा
पावस के बाद आज मनोहर उषा मे
ज्यादा
कडकते नभ मे मेघ निनाद मे कडकड सी आवाज
चिर नवल का मधुर रुप इन्द्र सुहाना पे
रंग राज
दर्शाता चित्र अनुरुप बरसातो के लाली के
बाद
गिरते थे बूँद झर झर प्रसुन रुप चमेली के अवसाद
अतुल अपार शक्ति देह लिये इन्द्रनीलमणि
सा विस्तार
अंन्त्र सतरंग उषा का प्रकाश लिये अर्धचन्द्र
स आकार
चमक निश्चल रुप कुंदन लिये धनु मणि
उद्गार
सतरंग अंचल के भंग लिये चमक मणि
अपार
अंतरंग तरंग चंचल रंग लिये तरंग कण
बौछार
मंडल मे चन्द्र आकार लिये धरे सतरंग
भाल
रशि्म विषम कण लिये बिखेरे सतरंग
धार
नील मणि सी ठिठक रही तितली सा
वो भंग
जहाँ से तितली लयी अपने उत्सुकता
के रंग
इन्द्रधनुष बिखेर ता धरा पर कण
सतरंग
भरी उमंग झडती जाये झरनो सा
धरे उमंग
नील मणि स चमक रहि मणि इन्द्र
के रंग
स्वर्ण रशिम को छिडक रही इस धरा
के पास
मणि देख सब अश्चर्य हुये सतरंग हुआ
आकाश
नवल रंग नवल पुलक भरे धरे मेघ
केश पाश
काले काले मेघ हटेअहवाहन सतरंग
झष
पालकि के शोभा जडे मणि मे मुक्तक
काँच
चले नक्षत्र संग मणि टोली लिये धनु के
आँच
सुवर्ण सतरंगो का भूधर पर स्नेहित
नाच
स्निग्ध प्रदीप्त प्रकाश लिये रंग नील
वृन्द
सुरभ्य थिर रहा सतरंग रजनी का दुग्ध
चन्द्र
अनादि है इस जहाँ मे तेरी माया की। ये
पंथ
उडे बिखरे जहाँ धरे सतरंग केभंग
विहंग
चमकिली सतरंगनी कि ओस होते तेरे
विस्तृत
फैले वसुधा। मे कण तेरे रुप भरे जल
अमृत
संतरण जो देख लिया पावस अनुरुप बुझी
तृप्त
व्याकुल था दर्शन पा लिया उस दिन मन
चित्त
रत्न हिलोर से भरे रत्न तेरे कन्ठ रंग
कुंडल
जो प्रकशित कर रहा नीलमणि सतरंग
मंडल
धरे सात रंग रखे मस्तक अकार चंद
चन्दन
भाव बाधा मुक्त तु चमक बिखेरे नभ
चमन
निरन्तर चमके नव किसलय पर कुछ
पल
उत्थान धीरे तनिक क्षण उपरान्त घेरे व्योम
तल
थोडे समय मे रंगच्छवित से कर देता संसार
अचल
प्रकाश अमल विस्तृत स्वर्ग लोक तक फैल जाये
कभी किरकिरी का नेत्र भ्रमण रूप वसुधा पर दर्शाये
मुकुट सतरंग साथ मेघो का पंख लिये मन हर्शये
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झलके घटा इन्द्रधनुष कि
भरे सतरंग चमक पुलक भरे
वह झलक रहा व्योम धरा के सीने मे
पुलकित किया आकाश को
अन्तर लिये धनु रंगिले से
चमक पडा था धीरे से
व्योम धरा के सीने मे
मेघ आये सतरंगे आाये
सतरंगो से इन्द्रधनुष भाये
अन्नत कण धनुष सतरंगो के
झलके थे धीरे से व्योम धरा के सीने मे
निकला क्षितिज पर जो देखने मै
भागा
रेशम स लटक रही पोशाक सीने का
धागा
प्राता कि निशा मे जब सपने से
जागा
देखा सुबह कि अरुणाई मे इन्द्रधनुष
सुभागा
नभ के उजाले मे निकला एक कोष मे
आधा
चन्द्र स चमके सतरंग यौवन पर उससा न
दागा
पावस के बाद आज मनोहर उषा मे
ज्यादा
कडकते नभ मे मेघ निनाद मे कडकड सी आवाज
चिर नवल का मधुर रुप इन्द्र सुहाना पे
रंग राज
दर्शाता चित्र अनुरुप बरसातो के लाली के
बाद
गिरते थे बूँद झर झर प्रसुन रुप चमेली के अवसाद
अतुल अपार शक्ति देह लिये इन्द्रनीलमणि
सा विस्तार
अंन्त्र सतरंग उषा का प्रकाश लिये अर्धचन्द्र
स आकार
चमक निश्चल रुप कुंदन लिये धनु मणि
उद्गार
सतरंग अंचल के भंग लिये चमक मणि
अपार
अंतरंग तरंग चंचल रंग लिये तरंग कण
बौछार
मंडल मे चन्द्र आकार लिये धरे सतरंग
भाल
रशि्म विषम कण लिये बिखेरे सतरंग
धार
नील मणि सी ठिठक रही तितली सा
वो भंग
जहाँ से तितली लयी अपने उत्सुकता
के रंग
इन्द्रधनुष बिखेर ता धरा पर कण
सतरंग
भरी उमंग झडती जाये झरनो सा
धरे उमंग
नील मणि स चमक रहि मणि इन्द्र
के रंग
स्वर्ण रशिम को छिडक रही इस धरा
के पास
मणि देख सब अश्चर्य हुये सतरंग हुआ
आकाश
नवल रंग नवल पुलक भरे धरे मेघ
केश पाश
काले काले मेघ हटेअहवाहन सतरंग
झष
पालकि के शोभा जडे मणि मे मुक्तक
काँच
चले नक्षत्र संग मणि टोली लिये धनु के
आँच
सुवर्ण सतरंगो का भूधर पर स्नेहित
नाच
स्निग्ध प्रदीप्त प्रकाश लिये रंग नील
वृन्द
सुरभ्य थिर रहा सतरंग रजनी का दुग्ध
चन्द्र
अनादि है इस जहाँ मे तेरी माया की। ये
पंथ
उडे बिखरे जहाँ धरे सतरंग केभंग
विहंग
चमकिली सतरंगनी कि ओस होते तेरे
विस्तृत
फैले वसुधा। मे कण तेरे रुप भरे जल
अमृत
संतरण जो देख लिया पावस अनुरुप बुझी
तृप्त
व्याकुल था दर्शन पा लिया उस दिन मन
चित्त
रत्न हिलोर से भरे रत्न तेरे कन्ठ रंग
कुंडल
जो प्रकशित कर रहा नीलमणि सतरंग
मंडल
धरे सात रंग रखे मस्तक अकार चंद
चन्दन
भाव बाधा मुक्त तु चमक बिखेरे नभ
चमन
निरन्तर चमके नव किसलय पर कुछ
पल
उत्थान धीरे तनिक क्षण उपरान्त घेरे व्योम
तल
थोडे समय मे रंगच्छवित से कर देता संसार
अचल
प्रकाश अमल विस्तृत स्वर्ग लोक तक फैल जाये
कभी किरकिरी का नेत्र भ्रमण रूप वसुधा पर दर्शाये
मुकुट सतरंग साथ मेघो का पंख लिये मन हर्शये
Friday, May 3, 2019
आत्मा चित्रांकनी मित्रो बहुत बाद आज मैने आपनी छोटी खण्डकाव्य का प्रकाशन किया मित्रों यदि आप सभी सहोभाव से मेरे इस काव्य को सराहे तो शायद फिर से एक बार एक बेहतर कवि का उदय हो मेरे प्रार्थना है मित्रो एक जरुर मेरे इस संग्रह को पढे ये आप को कही भी मिल सकती है आप इसको अमेजान से भी प्रात कर कते है धन्यावाद
करन कोविन्द
Aatmachtrankani blogspot.com
Aatmachtrankani blogspot.comThursday, May 2, 2019
भला कैसे भूल सकता हूँ।
उस रात कि पुष्पांजलि को जिसमे ह्रदय
तार
मन्द अमन्द अन्तस्थल मे गुंजित मधुवीणा प्रात
हल्कि विभावरी करते नक्षत्र प्रचार
उस तारे को अच्छे से जानता हूँ।
भला कैसे भूल सकता हूँ
कुन्ज कि किसलय मे मधुसूदन के प्राण
नेह के अधरो से गिरता प्रतिपल राल
उडती आती वृक्ष अंक से मन्द चाल
कैसे युक्त से आवरूध्द कर सकता हूँ।
भला कैसे भूल सकता हूँ।
रोज खद्दर जीवन से रूष्ट करता विलाप
कैसे सभालू जैविक क्रिया कलाप
हो मेरे कवि लक्ष्य का उद्दार
क्यो कठिनाईयों से पीछे भागता हूँ।
भला कैसे भूल सकता हूँ।
मन्दांकिनी
+++++++++
चित्रकूट से बहती हो
वीणा निनाद सी छनती हो
रमायण गाथा कहती हो
बर्षो से रहस्य को ढलती हो
जल से विनिमय करती हो
जल मे एक उष्मा संचार है
वही जीवन संसार है
छन छन जल छनकार है
धरा का निर्मल कंचनार है
लोक कथा सा खिल जाता बार बार है
मंदाकिनी मन्द मन्द प्रतिपल
प्रवाह अटल रंग अंचल
सफल छवि रुप कमल
+++++++++
चित्रकूट से बहती हो
वीणा निनाद सी छनती हो
रमायण गाथा कहती हो
बर्षो से रहस्य को ढलती हो
जल से विनिमय करती हो
जल मे एक उष्मा संचार है
वही जीवन संसार है
छन छन जल छनकार है
धरा का निर्मल कंचनार है
लोक कथा सा खिल जाता बार बार है
मंदाकिनी मन्द मन्द प्रतिपल
प्रवाह अटल रंग अंचल
सफल छवि रुप कमल
Wednesday, May 1, 2019
मधुमय यौवन लौटा दो!
मधुमय यौवन लौटा दो।.
विश्व की सारी व्याथाये राख संग मेरे धर दो
रक्त की सारी शिराओ मे उस्मा -संचित कर दो
संशय को सत्य कर दो!
मधुमय जीवन लौटा दो!
वो ऋतुओ कि नव - भव - यौवन
वो वायु की शीतलक- वैभव
कदम्ब - दल का सुगन्ध- मोहक
सारी कलाये दिखला दो!
मधुमय जीवन लौटा दो!
किरण - कुन्जो का अनुपम- दृश्य
चंचल वृक्ष से छनती छाह - मधुर
आवेग - मन्द- राग उस झंझा का
रूख मुझपर बरसा दो!
मधुमय जीवन लौटा दो !
विश्व की सारी व्याथाये राख संग मेरे धर दो
रक्त की सारी शिराओ मे उस्मा -संचित कर दो
संशय को सत्य कर दो!
मधुमय जीवन लौटा दो!
वो ऋतुओ कि नव - भव - यौवन
वो वायु की शीतलक- वैभव
कदम्ब - दल का सुगन्ध- मोहक
सारी कलाये दिखला दो!
मधुमय जीवन लौटा दो!
किरण - कुन्जो का अनुपम- दृश्य
चंचल वृक्ष से छनती छाह - मधुर
आवेग - मन्द- राग उस झंझा का
रूख मुझपर बरसा दो!
मधुमय जीवन लौटा दो !
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करन कोविंद
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इन्द्रधनुष ************ झलके घटा इन्द्रधनुष कि भरे सतरंग चमक पुलक भरे वह झलक रहा व्योम धरा के सीने मे पुलकित किया आकाश को अन्तर लिये...
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समय समय आ रहा अनन्त शान्त से न बूझो न देखो क्लान्त श्रान्त से कभी समय केवल मात्र नाम था उसमे भी केवल घ्रर उद्दम था कई बर्ष पहले खु...






